Tuesday, March 30, 2010

रजनी की कलम से .शेर शायरी.......

रजनी की कलम से .शेर शायरी.......

"भीगी है अब तलक मेरी कब्र की दीवारें,
लगता है अभी अभी कोई रो कर गया है "

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"हम जानते हैं सबको जन्नत नहीं मिलता,
पर ख्वाब सजाना "रजनी "कोई गुनाह तो नहीं."

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"कुछ कह गयी ये भीगी सी पवन मेरे कानों में,
अब तो हर रंजो गमों से अनजान हैं"

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गीला क्या करते वो हमसे ,
जिसने पल में खुद को,
बेगाना बना दिया,
वादा लिए फिरते थे वफाई का हमसे,
खुद बेवफाई से सिला दिया.

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"अपने को छोड़ आई हूँ मै तुम्हारे पास,
अच्छा होता तुम खुद ही मुझे लौटा दो"

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"छोड़ दिया मझधार में आ कर हमने भी हाथ,
क्योंकि तमन्ना मुझे बचने से ज्यादा डूबने की थी."

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"लिख देते हम भी अफसाना जो बन जाता इतिहास
अफ़सोस कोई पत्तःर ही नहीं आया मेरे हाथ."
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वो हर बाज़ी हमसे हारते गए,
मैंने अपनी जीत को जाहिर ना किया,
क्योंकि उसके टूटने का डर था हमें.

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क्या पाता है तू घर फूंक कर किसी का,
किसी के घर का चिराग बन कर देख.

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"मेरे मुकद्दर का लेख ,है यदि जंजीर,
जो बदल जाएगी ,तो तू इसे तोड़ के बता "
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मुनासिब नहीं सबको सागर मिले एक कतरा ही काफी है पीने के लिए,
पास हो चांदनी ये संभव नहीं उसकी रौशनी ही काफी है जीने के लिए.

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रूह में गहराइयों तक उतरती है कलाम ,
जब छूती है बिल्कुल पास से दिल को,
हर कलाम नहीं होता असर छोड़नेवाला,
कुछ खास होते हैं जो छाप छोड़ जाते हैं..

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