Sunday, December 11, 2011

ये इनाम कैसा जो सजा बन गई

मेरी खामोशियाँ ही सदा बन गयी,बेचैनियाँ जीने की वजा बन गयी,
दी  कैसी तुने  सौगात या  खुदा, ये  इनाम कैसा जो सजा बन गयी .

"रजनी "

12 comments:

  1. बहुत ही सुंदर लिखा है आपने...आभार।

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  2. वाह, क्या बात है.

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  3. क्या बात है ... कमाल का शेर है ...

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  4. hardik aabhar........kushumesh ji......

    aapko bhi mera hardik aabhar digambar ji .

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  5. behatareen!!!

    lekin jo inaam hota hai uski sazaa ka bhi apna mazaa hai...

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  6. Vah rajani ji badhai ...bahut sundar prastuti.Mere blog pr amantran sweekar kren,

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